भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण तिथियाँ
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● 2500-1750 ई.पू. : सिंधु सभ्यता की विस्तार अवधि.
● 599 ई. पू. : महावीर स्वामी का जन्म.
● 563 ई. पू. : महात्मा बुद्ध का जन्म.
● 326 ई. पू. : सिंकदर का भारत पर आक्रमण.
● 269 ई. पू. : अशोक की ताजपोशी.
● 57 ई. पू. : विक्रमी संवत् की शुरूआत.
● 78 ई. पू. : शक संवत् की शुरूआत.
● 320 ई. : गुप्त साम्राज्य की शुरूआत.
● 622 ई. : हिजरी संवत् की शुरूआत.
● 629-645 ई. : ह्नेनसांग की भारत यात्रा.
● 712 ई. : मुहम्मद बिन कासिम का भारत पर आक्रमण.
● 1001 ई. : महमूद गजनी (गजनवी) का पहला आक्रमण.
● 1027 ई. : महमूद गजनी का अंतिम आक्रमण .
● 1178 ई. : पृथ्वीराज चौहान का दिल्ली पर शासन प्रारंभ.
● 1191 ई. : तराईन की पहली लड़ाई में पृथ्वीराज द्वारा मोहम्मद
गोरी पराजित.
● 1192 ई. : तराईन की दूसरी लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान मोहम्मद
गोरी से पराजित.
● 1206 ई. : कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का पहला मुस्लिम सम्राट
बना.
● 1210 ई. : कुतुबद्दीन ऐबक का पुत्र आरामशाह अपने बहनोई
इल्तुतमिश द्वारा सत्ताच्युत.
● 1236 ई. : इल्तुतमिश का निधन.
● 1236-1240 ई. : रजिया बेगम का शासनकाल.
● 1246-1240 ई. : नसीरुद्दीन महमूद का शासन.
● 1266-1287 ई. : ग्यासुद्दीन बलबन का शासन.
● 1290 ई. : खिलजियों द्वारा बलबन के पोते कैकूबाद की हत्या,
जलालुद्दीन खिलजी द्वारा खिलजी शासन की स्थापना.
● 1296 ई. : अलाउद्दीन खिलजी का दिल्ली के सिंहासन पर
कब्जा.
● 1316 ई. : अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु.
● 1320 ई. : गाजी मलिक तुगलक द्वारा तुगलक वंश की स्थापना.
● 1325 ई. : मुहम्मद बिन तुगलक गद्दीनशीन.
● 1327 ई. : मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा अपनी राजधानी देवगिरि
(दौलताबाद) स्थानांतरित, कुछ समय बाद राजधानी दिल्ली वापस.
● 1336 ई. : विजयनगर साम्राज्य की हरिहर और बुक्का द्वारा
स्थापना.
● 1347 ई. : अलाउद्दीन बहमनी शाह द्वारा बहमनी सल्तनत की
स्थापना.
● 1351 ई. : मुहम्मद तुगलक का सिंध में निधन.
● 1398 ई. : दिल्ली पर तैमूर का आक्रमण, फिरोजाबाद, हरिद्वार,
मेरठ और जम्मू में भीषण तबाही व रक्तपात.
● 1414 ई. : खिज्र खाँ द्वारा सैयद वंश की स्थापना.
● 1451 ई. : पहले अफगान सुल्तान के रूप में बहलोल लोदी
गद्दीनशीन.
● 1459-1511 ई. : गुजरात के महान राजा सुल्तान महमूद बेगम
ने अपने शासनकाल में मिस्त्र की सेनाओं के साथ मिलकर पुर्तगाली
सेनाओं को हराया पर बाद में दीव में उन्हें एक कारखाना लगाने की
अनुमति दे दी.
● 1489-1510 ई. : जार्जिया के गुलाम युसुफ आदिल शाह ने
बीजापुर साम्राज्य की स्थापना की, उन्हें अपने समय के अच्छे
शासकों में गिना जाता है.
● 1440-1518 ई. : महान सूफी कवि दार्शनिक कबीर का समय.
कबीर ने अल्लाह और भगवान को एक ही बताते हुए इन धर्मों की
कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया.
● 1469-1539 ई. : गुरु नानक ने अपनी शिक्षाओं से लोगों को
काफी प्रभावित किया और आगे चलकर सिख धर्म की स्थापना की.
● 1484 ई. : सूरदास का जन्म हुआ, सूरदास ने कृष्ण भक्ति को
एक नया आयाम दिया.
● 1498 ई. : वास्को डि गामा का भारत आगमन, उसके आगमन से
ही भारत में पश्चिम का प्रादुर्भाव हुआ.
● 1510 ई. : पुर्तगालियों द्वारा गोवा पर कब्जा, अल्बुकर्क
गवर्नर नियुक्त किया.
● 1526 ई. : इब्राहिम लोदी और बाबर के बीच पानीपत की पहली
लड़ाई, बाबर द्वारा मुगल साम्राज्य की स्थापना, आगरा राजधानी के
रूप में स्थापित.
● 1527 ई. : खानवा की लड़ाई में मेवाड़ के राजा राणा सांगा बाबर
से पराजित.
● 1529 ई. : बाबर द्वारा घाघरा की लड़ाई में महमूद लोदी
पराजित.
● 1530 ई. : बाबर का निधन, हुमायूँ द्वारा कालिंजर का शासक
प्रताप रुद्रेदव पराजित.
● 1539 ई. : चौसा की लड़ाई में हुमायूँ शेरशाह से पराजित.
● 1540 ई. : बिलग्राम (कन्नौज) की लड़ाई में हुमायूँ शेरशाह सूरी
से पराजित, शेरशाह का शासन प्रारंभ.
● 1545 ई. : कालिंजर की लड़ाई में विस्फोट से घायल होने के बाद
शेरशाह की मृत्यु.
● 1555 ई. : हुमायूँ का दिल्ली पर पुन: कब्जा.
● 1556 ई. : सीढ़ियों से गिरने से हूमायूँ की मृत्यु, पानीपत की
दूसरी लड़ाई में आदिलशाह सूरी के मंत्री हेमू की मुगल प्रधानमंत्री
बैरम खाँ के हाथों पराजय.
● 1560 ई. : बैरम खां के हाथों से अकबर ने सत्ता अपने हाथों में
ली.
● 1564 ई. : अकबर ने हिंदुओं के ऊपर से जजिया कर हटाया.
● 1576 ई. : हल्दी घाटी की लड़ाई.
● 1582 ई. : अकबर द्वारा दीन-ए-इलाही नामक धर्म का प्रसार.
● 1600 ई. : अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना.
● 1605 ई. : अकबर का निधन.
● 1609 ई. : हालैंड की कंपनी द्वारा पुलीकट में फैक्ट्री स्थापित.
● 1611 ई. : अंग्रेजों की कंपनी द्वज्ञरा मसूलीपटनम् में फैक्ट्री
स्थापित.
● 1613 ई. : जहांगीर द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी को सूरत में
फैक्ट्री स्थापित करने की आज्ञा.
● 1615 ई. : सर टॉमस रो मुगल दरबार में पहले अंग्रेज राजदूत
नियुक्ति.
● 1627 ई. : कश्मीर के पास जहांगीर की मृत्यु.
● 1628. : शाहजहां (खुर्रम) गद्दीनशीन.
● 1639 ई. : अंग्रेजों की कंपनी द्वारा मद्रास में फोर्ट सेंट जॉर्ज
की स्थापना.
● 1646 ई. : मुगल राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानांतरित.
● 1653 ई. : ताजमहल बनकर पूरा हुआ.
● 1668 ई. : औरंगजेब आलमगीर नया मुगल बादशाहऋ सूरत में
फ्रांसीसियों की प्रथम फैक्ट्री स्थापित.
● 1659 ई. : मराठा राजा शिवाजी द्वारा बुद्धिमत्ता से अफजल
खाँ की हत्या.
● 1666 ई. : शाहजहाँ की मृत्यु.
● 1677 ई. : औरंगजेब द्वारा सरकारी नौकरियों में हिंदुओं के
प्रवेश पर रोक.
● 1679 ई. : हिंदुओं पर जजिया कर पुन: लागू.
● 1680 ई. : शिवाजी का निधन.
● 1690 ई. : औरंगजेब द्वारा कलकत्ता में एक व्यापारिक केंद्र
की स्थापना.
● 1707 ई. : औरंगजेब की अहमदनगर में मृत्यु.
● 1708 ई. : सिखों के धर्मगुरु गुरु गोविंद सिंह की हत्या.
● 1713-19 ई. : फर्रूखसियर का शासन.
● 1739 ई. : फारस के शासक नादिरशाह का भारत पर आक्रमण.
● 1748 ई. : प्रथम अंग्रेज-फ्रांसीसी युद्ध.
● 1757 ई. : प्लासी का युद्ध, अंग्रेजों द्वारा बंगाल का नवाब
सिराजुउद्दौला पराजित.
● 1760 ई. : वांडीवाश का युद्ध, अंग्रेजों के हाथों फ्रांसीसियों की
हार.
● 1761 ई. : पानीपत का तीसरी लड़ाई में अहमदशाह अब्दाली
द्वारा मराठे पराजित.
● 1764 ई. : बक्सर की लड़ाई में अंग्रेजों द्वारा शाह आलम
द्वितीय, शुजाउद्दौला और मीर कासिम पराजित.
● 1765 ई. : अंग्रेजों को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी
हासिल, क्लाइव बंगाल का गवर्नर नियुक्त.
● 1766 ई. : अंग्रेजों का कर्नाटक में उत्तरी सरकार पर अधिकार.
● 1767-79 ई. : प्रथम मैसूर युद्ध, अंग्रेज मैसूर के हैदर अली के
साथ अपमानजनक शर्तों पर संधि करने पर मजबूर.
● 1772 ई. : वॉरेन हेस्टिंग्स बंगाल का गवर्नर नियुक्त.
● 1773 ई. : ब्रिटिश संसद द्वारा रेग्यूलेटिंग एक्ट पास.
● 1775-82 ई. : प्रथम अंग्रेज-मराठा युद्ध, सालबाई की संधि.
● 1780-84 ई. : दूसरा मैसूर युद्ध, हैदर अली की मृत्यु.
● 1784 ई. : पिट्स का इंडिया एक्ट.
● 1790-92 ई. : अंग्रेजों और टीपू के बीच तीसरा मैसूर युद्ध,
श्रीरंगपट्टम की संधि.
● 1793 ई. : बंगाल का स्थायी बंदोबस्त.
● 1798 ई. : वेलेजली भारत का गवर्नर जनरल नियुक्त.
● 1799 ई. : चौथा मैसूर युद्ध, अंग्रेजों द्वारा टीपू की हार, टीपू
की मृत्यु, मैसूर का विभाजन.
● 1801 ई. : अंग्रेजों द्वारा कर्नाटक का विलय.
● 1803-06 ई. : दूसरा अंग्रेज-मराठा युद्ध , आर्थर वेलेजली के
नेतृत्व में अंग्रेजों द्वारा ‘असई’ नामक स्थान पर मराठों की बुरी
तरह हार.
● 1817-19 ई. : तीसरा अंग्रेज मराठा युद्ध, अंग्रेजों द्वारा
मराठों की पूर्ण रूप से पराजय.
● 1828 ई. : लॉर्ड विलियम बैंटिंक गवर्नर-जनरल नियुक्त,
सामाजिक सुधारों का काल शुरूऋ सती निषेध (1829), ठगों का दमन
(1837).
● 1845-46 ई. : प्रथम अंग्रेज-सिख युद्ध, सिखों की हार.
● 1848 ई. : लॉर्ड डलहौजी गवर्नर-जनरल नियुक्त.
● 1848-49 ई. : द्वितीय अंग्रेज-सिख युद्ध, सिखों की हार.
● 1848 ई. : अंग्रेजों द्वारा पंजाब की विलय.
● 1853 ई. : भारत में बंबई से थाणे के बीच पहली रेल की
शुरूआत.
● 1854 ई. : चाल्र्सवुड डिस्पैच (शिक्षा पर).
● 1857-58 ई. : स्वाधीनता की पहली लड़ाई.
● 1858 ई. : ब्रिटिश सम्राट द्वारा भारत में अंग्रेजी राज्य को
अपने हाथों में लेने की घोषणा, महारानी विक्टोरिया का घोषणा-पत्र.
● 1861 ई. : इंडियन काउंसिल एक्ट, इंडियन हाईकोट्र्स ऐक्ट,
इंडियन पीनल कोड.
● 1877 ई. : दिल्ली दरबार.
● 1878 ई. : वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट.
● 1881 ई. : प्रथम फैक्ट्री एक्ट, मैसूर राज्य उसके असली
शासके के सुपुर्द.
● 1882-83 ई. : हंटर आयोग का गठन.
● 1885 ई. : इंडियन नेशनल कांग्रेस का पहला अधिवेशन.
● 1892 ई. : भारत के प्रशासक को विनियमित करने हेतु इंडियन
काउंसिल एक्ट.
● 1899 ई. : लॉर्ड कर्जन गवर्नर-जनरल और वायसराय
नियुक्त.
● 1904 ई. : भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम.
● 1905 ई. : बंगाल का प्रथम विभाजन.
● 1906 ई. : मुस्लिम लीग की स्थापना.
● 1907 ई. : कांग्रेस का सूरत अधिवेशन, कांग्रेस में प्रथम
विभाजन (दो दलों में बँटी-नरम और गरम दल).
● 1909 ई. : मार्ले-मिंटो सुधार.
● 1911 ई. : दिल्ली में सम्राट जार्ज और साम्राज्ञी मेरी का
दरबार, बंगाल विभाजन रद्द और बंगाल प्रेसीडेंसी का निर्माण, देश
की राजधानी कलकता से हटाकर दिल्लीस्थानांतरित.
● 1914 ई. : प्रथम विश्वयुद्ध शुरू.
● 1918 ई. : प्रथम विश्व युद्ध समाप्त.
● 1919 ई. : रौलेट एक्ट के विरुद्ध देशव्यापी विरोध, जलियाँवाला
बाग का हत्याकांड.
● 1920 ई. : कांग्रेस द्वारा असहयोग आंदोलन की स्वीड्डति,
विद्यार्थियों द्वारा कॉलेज और वकीलों द्वारा वकालत का त्याग,
सुधारों के प्रति जन-असंतोष प्रदर्शित करने हेतु ● ब्रिटिश कपड़ों
का होलिका दहन.
● 1921 ई. : मालाबार में मोपला विद्रोह, प्रिंस ऑफ वेल्स की
भारत यात्रा, राष्ट्रव्यापी हड़ताल, भारत में जनगणना, प्रथम बार
जनसंख्या ह्नांस.
● 1922 ई. : असहयोग आंदोलन, कांग्रेस द्वारा गाँधीजी आंदोलन
के एकमात्र नेता घोषित, चौरी-चौरा में हिंसा, गाँधी जी द्वारा
आंदोलन स्थगित.
● 1923 ई. : चितरंजनदास और मोतीलाल नेहरू द्वारा स्वराज
पार्टी का निर्माण.
● 1927 ई. : इंडियन नेवी एक्ट, साइमन कमीशन की नियुक्ति.
● 1928 ई. : साइमन कमीशन का भारत आगमन, सभी दलों द्वारा
कमीशन का बहिष्कार.
● 1929 ई. : कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में आजादी की माँग.
● 1930 ई. : 26 जनवरी को पहली बार सारे देश में स्वाधीनता
दिवस का आयोजन, सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ, गाँधी जी
द्वारा दांडी मार्च-नमक सत्याग्रह, सरकार का दमन चक्र, प्रथम
गोलमेज सम्मेल.
● 1931 ई. : गाँधी-इरविन समझौता, दूसरा गोलमेज सम्मेलन.
● 1932 ई. : कांग्रेज आंदोलन को कुचलने का प्रयास, तीसरा
गोलमेज सम्मेलन, सांप्रदायिक निर्णय, पूना समझौता.
● 1934 ई. : सविनय अवज्ञा आंदोलन की वापसी.
● 1935 ई. : गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट.
● 1937 ई. : प्रांतीय स्वायत्तता का उद्घाटन, बहुसंख्य प्रांतों में
कांग्रेस की सरकारें सत्तासीन.
● 1939 ई. : दूसरा विश्व युद्ध शुरू, कांग्रेस सरकार द्वारा
त्यागपत्र, भारत में राजनीतिक गतिरोध.
● 1942 ई. : भारत में क्रिप्स मिशन का दौरा, कांग्रेस और
मुस्लिम लीग द्वारा क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव का विरोध, कांग्रेस
द्वारा भारत छोड़ो प्रस्ताव पास
● 1943 ई. : लॉर्ड वेवेल भारत के वायसराय और गवर्नर-जनरल
नियुक्त, समझौते के लिए वेवेल का प्रस्ताव, कांग्रेस और मुस्लिम
लीग द्वारा वेवेल प्रस्ताव से असहमति.
● 1945 ई. : शिमला सम्मेलन, वेवल योजना की असफलता, लाल
किले में आजाद हिन्द फौज के सैनिक अधिकारियों पर मुकदमा.
● 1946 ई. : ब्रिटिश कैबिनेट मिशन का भारत आगमन, केंद्र में
अंतरिम सरकार की स्थापना, दिल्ली में 9 दिसंबर को संविधान सभा
का उद्घाटन
Friday, 27 May 2016
भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण तिथियाँ
Wednesday, 18 May 2016
मौर्योत्तर काल
मौर्योतर काल:-
सामान्यतः 200 ईसा-पूर्व से मौर्योत्तर काल की शुरूआत मानी
जाती है।
पूर्वी भारत, मध्य भारत और दक्कन में मौर्यों के स्थान पर कई
स्थानीय शासक सत्ता में आए, जैसे शुंग, कण्व, और सातवाहन।
पश्चिमोत्तर भारत में मौर्यों के स्थान पर मध्य एशिया से आकर
जमे कई राजवंशों ने अपना आसन जमाया।
शुंग वंश:-
पुष्यमित्र शुंग द्वारा मौर्य शासक वृहद्रथ की हत्या के बाद इस
वंश की स्थापना 185 ई. पू. में हुई।
पुष्यमित्र शुंग ने संभवतः दो अश्वमेध यज्ञ किए।
बौद्ध ग्रथों के अनुसार पुष्यमित्र शुंग ने ‘अशोक’ द्वारा निर्मित
84,000 स्तूपों को नष्ट कर दिया।
कण्व वंश:-
शुंग वंश के अन्तिम सम्राट् ‘देवभूति’ की हत्या के बाद ‘वासुदेव’ ने
75 ई. पू. में ‘कण्व वंश’ की स्थापना की।
हिन्द-यूनानी (इण्डो-ग्रीक):-
लगभग 200 ई. पू. से बार-बार हमले होने लगे। सर्वप्रथम
यूनानियों ने हिन्दूकुश पार किया। वे उत्तर अफगानिस्तान के
अन्तर्गत वक्षु (ओक्सस) नदी के दक्षिण बैक्ट्रिया में राज करते
थे।
भारत की सीमा में सर्वप्रथम प्रवेश ‘डेमेट्रियस प्रथम’ ने किया
था।
इसने ‘साकल’ को अपनी राजधानी बनाई थी।
इसके बाद ‘यूक्रेटाइड्स’ शासक बना। इसकी राजधानी ‘तक्षशिला’
थी।
सबसे अधिक विख्यात हिन्द-यूनानी शासक हुआ मिनान्दर। वह
मिलिन्द नाम से भी जाना जाता है। उसकी राजधानी पंजाब में साकल
(आधुनिक सियालकोट) में थी, और उसने गंगा-यमुना दोआब पर
आक्रमण किया।
उसे नागसेन ने बौद्ध धर्म की दीक्षा दी। नागार्जुन इस नागसेन का
ही नामान्तर है।
मिनान्दर ने नागसेन से बौद्ध धर्म पर अनेक प्रश्न पुछे। ये प्रश्न
और नागसेन द्वारा दिए गए उनके उत्तर एक पुस्तक के रूप में
संगृहित हैं जिसका नाम है ‘मिलिन्दपन्हों’ अर्थात् ‘मिलिन्द के
प्रश्न’।
सर्वप्रथम इण्डो-ग्रीकों द्वारा ही भारत में लेखयुक्त सिक्के चलाए
गए।
सबसे पहले भारत में हिन्द-यूनानियों ने ही सोने के सिक्के जारी किए,
जिनकी मात्रा कुषाणों के शासन में बढ़ी।
हिन्द-यूनानी शासकों ने भारत के पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त में यूनान
की प्राचीन कला चलाई जिसे ‘हेलेनिस्टिक आर्ट’ कहते हैं।
शक:-
यूनानियों के बाद शक आए।
शकों की पाँच शाखाएँ थीं और हर शाखा की राजधानी भारत और
अफगानिस्तान में अलग-अलग भागों में थी।
भारतीय स्रोतों में शकों को ‘सीथियन’ नाम दिया गया है।
लगभग 58 ई. पू. में उज्जैन में एक राजा हुआ। उसने शकों से युद्ध
किया, उन्हें पराजित किया और अपने ही समय में उन्हें बाहर खदेड़
देने में सफल हो गया। वह अपने को ‘विक्रमादित्य’ कहता था।
विक्रम संवत् नाम का एक नया संवत् 57 ई. पू. में शकों पर विजय
से आरम्भ हुआ। तब से विक्रमादित्य एक स्पृहणीय उपाधि हो गया,
ऊँची प्रतिष्ठा और सत्ता का प्रतीक बन गया।
भारतीय इतिहास में विक्रमादित्यों की संख्या 14 तक पहुँच गई है।
सबसे अधिक विख्यात शक शासक ‘रुद्रदामन् प्रथम’ (130-150
ई.) हुआ। वह इतिहास में इसलिए प्रसिद्ध है कि उसने काठियावाड़
के अर्धशुष्क क्षेत्र की मशहूर झील सुदर्शन सर का जीर्णोद्धार
किया। यह झील बहुत पुराने समय मौर्य काल की है और दीर्घ काल
से सिंचाई के काम में आती रही है।
पार्थियाई का महत्त्व:-
पश्चिमोत्तर भारत में शकों के आधिपत्य के बाद पार्थियाई लोगों का
आधिपत्य हुआ।
प्राचीन भारत के अनेक संस्कृत ग्रंथों में इन दोनों जनों के एक साथ
उल्लेख शकपह्लव के रूप में मिलते हैं।
पार्थियाई लोगों का मूल वास स्थान ईरान में था।
सबसे प्रसिद्ध पार्थियाई राजा हुआ ‘गोन्दोफिर्नस’। उसके शासन
काल में ‘सेन्ट टामस’ ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए भारत
आया था।
कुषाण:-
पार्थियाइयों के बाद कुषाण आए, जो ‘यूची‘ और ‘तोखारी‘ भी
कहलाते हैं।
वे उत्तरी मध्य एशिया के हरित मैदानों के खानाबदोश लोग थे और
चीन के पड़ोस में रहते थे।
कुषाणों के दो राजवंश थे जो एक के बाद एक आए व पहले राजवंश
की स्थापना ‘कडफिस’ नामक सरदारों के एक घराने ने की। उसका
शासन 50 ई. से 28 वर्षों तक चला। इसमें दो राजा हुए। पहला
हुआ ‘कडफिस प्रथम’, जिसने हिन्दूकुश के दक्षिण में सिक्के चलाए।
उसने रोमन सिक्कों की नकल करके तांबे के सिक्के ढलवाये।
दूसरा राजा हुआ ‘कडफिस द्वितीय’ उसने बड़ी संख्या में स्वर्ण
मुद्राएँ जारी कीं और अपना राज्य सिन्धु नदी के पूरब में फैलाया।
कडफिस राजवंश के बाद ‘कनिष्क राजवंश’ आया। इस वंश के
राजाओं ने ऊपरी भारत और निम्न सिन्धु घाटी में अपना प्रभुत्व
फैलाया।
आरम्भिक कुषाण राजाओं ने बड़ी संख्या में स्वर्ण मुद्राएँ जारी कीं।
उनकी स्वर्ण मुद्राएँ धातु की शुद्धता में गुप्त स्वर्ण मुद्राओं से
उत्कृष्ट हैं।
मथुरा में जो कुषाणों के सिक्के, अभिलेख, संरचनाएँ और मूर्तियाँ
मिली हैं उनसे प्रकट होता है कि मथुरा भारत में कुषाणों की द्वितीय
राजधानी थी।
पहली राजधानी पुरुषपुर या पेशावर में थी, जहाँ कनिष्क ने एक मठ
और एक विशाल स्तूप का निर्माण कराया।
कनिष्क सर्वाधिक विख्यात कुषाण शासक था।
उसने 78 ई. में एक संवत् चलाया जो ‘शक संवत्’ कहलाता है और
भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लाया जाता है।
शकों और कुषाणों ने पगड़ी, ट्यूनिक (कुरती), पाजामा और भारी
लम्बे कोट चलाए।
कुषाणों ने रेशम के उस प्रख्यात मार्ग पर नियन्त्राण कर लिया जो
चीन से चलकर कुषाण साम्राज्य में शामिल मध्य एशिया और
अफगानिस्तान से गुजरते हुए ईरान जाता था, और पूर्वी
भूमध्यसागरीय अंचल में रोमन साम्राज्य के अन्तर्गत पश्चिम
एशिया जाता था। यह रेशम मार्ग कुषाण का एक बड़ा आय-स्रोत
था।
भारत में बड़े पैमाने पर सोने का सिक्का चलाने वाले प्रथम शासक
कुषाण ही थे।
कुषाण शासक शिव और बुद्ध दोनों के उपासक थे। तदनुसार कुषाण
मुद्राओं पर हम इन दोनों देवताओं के चित्र पाते हैं।
कई कुषाण शासक वैष्णव हो गए। इस कोटि में निश्चित रूप से
कुषाण शासक वासुदेव आता है।
ईस्वी सन् के आरम्भ से बुद्ध की प्रतिमा बननी प्रारंभ हुई।
कनिष्क महायान का महान् संरक्षक हो गया। उसने कश्मीर में बौद्धों
की एक परिषद् आयोजित की। पार्षदों ने 3,00,000 शब्दों में एक
ग्रन्थ की रचना की जिसमें तीनों पिटकों या बौद्ध साहित्य की
पिटारियों की पूरी तरह व्याख्या की गई।
मौर्योत्तर काल में ‘महायान संप्रदाय’ का ज्यादा विकास हुआ।
कुषाणों के समय ‘गांधार कला’ का विकास हुआ।
मथुरा कला, देशी कला शैली थी।
गांधार कला में हेलेनिस्टिक प्रभाव (यूनानी प्रभाव) दृष्टिगत होता
है।
महायान संप्रदाय इससे प्रभावित हुआ था।
कनिष्क की शिरोहिन खड़ी विख्यात मूर्ति मथुरा शैली में बनी है,
जिसके निचले भाग में कनिष्क का नाम खुदा है।
विदेशी राजाओं ने संस्कृत साहित्य को संरक्षण-संपोषण किया।
काव्य शैली का पहला नमूना रुद्रदामन् का काठियावाड़ अभिलेख है
जिसका समय लगभग 150 ई. है। यह संस्कृत में लिखा प्रथम
अभिलेख है। इसके बाद से अभिलेख प्रांजल संस्कृत भाषा में लिखे
जाने लगे थे।
‘अश्वघोष’ चतुर्थ बौद्ध संगीति का उपाध्यक्ष था।
‘अश्वघोष’ कनिष्क का दरबारी था।
‘अश्वघोष’ ने बुद्ध की जीवनी ‘बुद्धचरित’ के नाम से लिखी।
अश्वघोष ने ‘सौन्दरानन्द’ नामक काव्य भी लिखा जो संस्कृत काव्य
का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
कनिष्क को पतलून और लम्बे जूतों में चित्रित किया गया है।
चमड़े के जूते बनाने का प्रचलन भारत में सम्भवतः इसी काल में
आरम्भ हुआ।
भारत में चले ताँबे के कुषाण कालीन सिक्के रोमन सिक्कों की नकल
थे। इसी तरह भारत में कुषाणों ने जो सोने के सिक्के ढलवाए वे रोमन
स्वर्णमुद्राओं की नकल थे।
सातवाहन युग:-
मध्य भारत में मौर्यों के उत्तराधिकारी सातवाहन हुए।
सातवाहनों का सबसे पुराना अभिलेख ईसा-पूर्व पहली सदी का है,
जब उन्होंने कण्वों को पराजित कर मध्य भारत के कुछ भागों में
अपनी सत्ता स्थापित की।
सातवाहन वंश का संस्थापक ‘सिमुक’ था।
प्रथम योग्य शासक ‘सातकर्णि प्रथम’ था।
सातकर्णि प्रथम ने दो अश्वमेध यज्ञ तथा एक राजसूय यज्ञ
किया।
सातवाहन शासक ‘हाल’ के राजसभा में ‘गुणाढ्य’ नामक कवि निवास
करते थे। इन्होंने ‘वृहत्कथा’ नामक पुस्तक लिखी।
सातवाहन वंश के ऐश्वर्यपूर्ण शासक गौतमीपुत्र शातकर्णि
(106-130 ई) ने अपने को एकमात्र ब्राह्मण कहा, शकों को
हराया और अनेक क्षत्रिय शासकों का नाश किया।
गौतमीपुत्र शातकर्णि ने ‘वेणकटक स्वामी’ की उपाधि धारण की।
गौतमीपुत्र के उत्तराधिकारियों ने 220 ई. तक राज किया। इसके
प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी वासिष्ठीपुत्र पुलुमायिन् (130-154 ई.)
के सिक्के और अभिलेख आन्ध्र में पाए गए हैं, जो बताते हैं कि यह
क्षेत्र दूसरी सदी के मध्य तक सातवाहन राज्य का अंग बन चुका
था। उसने अपनी राजधानी आन्ध्र प्रदेश के औरंगाबाद जिले में
गोदावरी नदी के किनारे पैठान या प्रतिष्ठान में बनाई।
सौराष्ट्र (काठियावाड़) के शक शासक रुद्रदामन् प्रथम (130-150
ई.) ने सातवाहनों को दो बार हराया।
यज्ञश्री शातकर्णि (165-194 ई.) ने उत्तर कोंकण और मालवा
को शक शासकों से वापस ले लिया। वह व्यापार और जलयात्रा का
प्रेमी था।
सातवाहनों ने स्वर्ण का प्रयोग बहुमूल्य धातु के रूप में किया होगा
क्योंकि उन्होंने कुषाणों की तरह सोने के सिक्के नहीं चलाए। उनके
सिक्के अधिकांश सीसे के हैं जो दक्कन में पाए जाते हैं। उन्होंने
पोटीन, ताँबे और कांसे की मुद्राएँ भी चलाई।
भारी संख्या में मिले रोमन और सातवाहन सिक्कों से बढ़ते हुए
व्यापार का संकेत मिलता है।
गौतमीपुत्र शातकर्णि ने कहा है कि उसने विच्छिन्न होते चातुर्वण
(चार वर्णों वाली व्यवस्था) को फिर से स्थापित किया और वर्ण-
संकर (वर्णों और जातियों के सम्मिश्रण) को रोका।
ब्राह्मणों को भूमिदान या जागीर देने वाले प्रथम शासक सातवाहन ही
हुए।
सातवाहनों में हमें मातृतंत्रात्मक ढाँचे का आभास मिलता है। उनके
राजाओं के नाम उनकी माताओं के नाम पर रखने की प्रथा थी।
किन्तु सातवाहन राजकुल पितृतंत्रात्मक था क्योंकि राजसिंहासन का
उत्तराधिकारी पुत्र ही होता था।
सातवाहनों के समय में जिला को अशोक के काल की तरह ही ‘आहर’
कहते थे। उनके अधिकारी मौर्य काल की तरह ही, अमात्य और
महामात्य कहलाते थे।
सेनापति को प्रान्त का शासनाध्यक्ष या गवर्नर बनाया जाता था।
ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासन का काम ‘गौल्मिक’ को सौंपा जाता था।
गौल्मिक एक सैनिक टुकड़ी का प्रधान होता था जिसमें नौ रथ, नौ
हाथी, पच्चीस घोड़े और पैंतालीस पैदल सैनिक होते थे।
सातवाहन के अभिलेखों में कटक और स्कन्धावार शब्दों का खूब
उल्लेख मिलता है। वे सैनिक शिविर और
सातवाहनों ने ब्राह्मणों और बौद्ध भिक्षुओं को कर-मुक्त ग्रामदान
देने की प्रथा आरम्भ की।
सातवाहन राज्य में सामन्तों की तीन श्रेणियाँ थीं। पहली श्रेणी का
सामन्त राजा कहलाता था और उसे सिक्का ढालने का अधिकार रहता
था। द्वितीय श्रेणी का महाभोज कहलाता था, और तृतीय श्रेणी का
सेनापति।
सातवाहन शासकों ने भिक्षुओं को ग्रामदान दे-देकर बौद्ध धर्म को
बढ़ाया। उनके राज्य में बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय का
बोलबाला था, खासकर शिल्पियों के बीच।
‘चैत्यों’ का उपयोग वर्षा काल में भिक्षुओं के निवास के लिए होता
था।
‘स्तूप’ एक गोल स्तम्भाकार ढाँचा है जो बुद्ध के किसी अवशेष के
ऊपर खड़ा किया जाता था। अमरावती स्तूप का निर्माण लगभग
200 ई. पू. में आरम्भ हुआ।
अमरावती का स्तूप भित्ति-प्रतिमाओं से भरा हुआ है, जिनमें बुद्ध के
जीवन के विभिन्न दृश्य उकेरे हुए हैं।
नागार्जुनकोंडा सातवाहनों के उत्तराधिकारी इक्ष्वाकुओं के काल में
अपने उत्कर्ष की चोटी पर था।
सातवाहनों की राजकीय भाषा प्राकृत थी। सभी अभिलेख इसी भाषा
में और ब्राह्मी लिपि में लिखे हुए हैं।
‘गाथासप्तशती,’ सातवाहन नरेश ‘हाल’ की रचना बताई जाती है।
मौर्योत्तर युग में शिल्प, व्यापार और नगर
मौर्यपूर्व काल में मथुरा शाटक नामक एक विशेष प्रकार के वस्त्र
के निर्माण का एक प्रमुख केंन्द्र बन गया।
तमिलनाडु में तिरुचिरापल्ली नगर के उपान्तवर्ती उरेऊ में ईंटों का
बना एक रंगाई का हौज मिला है। अरिकमेदु में भी इस तरह के हौज
मिले हैं। ये हौज ईसा की पहली-तीसरी सदियों के हैं।
शिल्पी लोग आपस में संगठित होते थे, जिनके संगठन का नाम
‘श्रेणी’ था। इस काल के शिल्पियों की कम-से-कम चैबीस-पच्चीस
श्रेणियाँ प्रचलित थीं।
ज्ञात अधिकतर शिल्पी मथुरा क्षेत्र में तथा पश्चिमी दक्कन में जमे
थे, जो पश्चिमी समुद्र तट की ओर जाने वाले व्यापार-मार्ग पर
पड़ते हैं।
इस काल की सबसे बड़ी आर्थिक घटना थी भारत और पूर्वी रोमन
साम्राज्य के बीच फूलता-फलता व्यापार।
ईसा की पहली सदी से व्यापार मुख्यतः समुद्री मार्ग से होने लगा।
पश्चिमी समुद्र तट पर भड़ौच और सोपारा, तथा पूर्वी तट पर
अरिकमेदु और ताम्रलिप्ति था। इन सभी बन्दरगाहों में भड़ौच सबसे
महत्त्वपूर्ण और उन्नतिशील था।
उत्तरापथ तक्षशिला से चलकर आधुनिक पंजाब से होते हुए यमुना के
पश्चिम तट पहुँचता था और यमुना का अनुसरण करते हुए दक्षिण की
ओर मथुरा पहुँचता था। फिर मथुरा से मालवा के उज्जैन पहुँचकर वहाँ
से पश्चिमी समुद्र तट पर भड़ौच जाता था। उज्जैन में आकर एक
और मार्ग उससे मिलता था, जो इलाहाबाद के समीप कौशाम्बी से
निकला था।
रोम वालों ने सबसे पहले देश के सुदूर दक्षिणी हिस्से से व्यापार
आरम्भ किया; इसीलिए उनके सबसे पहले के सिक्के तमिल राज्यों में
मिले हैं, जो सातवाहन के राज्यक्षेत्र के बाहर हैं।
रोम वाले मुख्यतः मसालों का आयात करते थे जिनके लिए दक्षिण
भारत मशहूर था।
रेशम चीन से सीधे रोमन साम्राज्य को अफगानिस्तान और ईरान से
गुजरने वाले रेशम-मार्ग से भेजा जाता था।
रोमन लोग भारत को शराब, शराब के दोहत्थे कलश और मिट्टी के
अन्यान्य प्रकार के पात्र भेजते थे। ये वस्तुएँ पश्चिमी बंगाल के
तामलुक, पांडिचेरी के निकट के अरिकमेदु और दक्षिण भारत के कई
अन्य स्थानों में खुदाई में मिली हैं।
रोम से भारत आई वस्तुओं में सबसे महत्त्व के हैं ढेर-सारे रोमन
सिक्के, जो प्रायः सोने और चाँदी के हैं।
रोमन लेखक प्लिनी ने 77 ई. में लैटिन में लिखे ‘नेचुरल हिस्ट्री’
नामक अपने विवरण में दुख भरे शब्दों में कहा है कि ‘‘भारत के साथ
व्यापार करके रोम अपना स्वर्ण भंडार लुटाता जा रहा है।’’
पश्चिम के लोगों को भारतीय गोल मिर्च इतनी प्रिय थी कि संस्कृत
में गोल मिर्च का नाम ही पड़ गया ‘यवनप्रिय।’
कुषाण सम्भवतः मध्य एशिया से सोना प्राप्त करते थे। उन्हें यह
सोना या तो कर्नाटक से मिला होगा या दक्षिण बिहार की ढालभूम
स्वर्ण-खानों से, जो बाद में उनके अधिकार में आ गईं।
रोम से सम्पर्क के फलस्वरूप कुषाणों ने दीनार सदृश स्वर्णमुद्राएँ
जारी कीं, जो गुप्तों के शासन काल में खूब प्रचलित हुईं।
परन्तु स्वर्ण मुद्राओं का प्रयोग रोजमर्रे के लेन-देन में नहीं होता
होगा, ये लेन-देन सीसे, पोटीन या ताँबे के सिक्कों से चलते थे।
कुषाणों ने उत्तर और पश्चिमोत्तर भारत में ताँबे के सिक्के सबसे
अधिक संख्या में जारी किए।
सातवाहन काल में पश्चिमी और दक्षिणी भारत में तगर (तेर),
पैठान, धान्यकटक, अमरावती, नागार्जुनकोंडा, भड़ौच, सोपारा,
अरिकमेदु, कावेरी-पट्टनम ये सभी समृद्ध नगर थे। तेलंगाना में कई
सातवाहन बस्तियाँ खुदाई में निकली हैं।
पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नगर इसलिए फूलते-फलते रहे
कि कुषाणशक्ति का केन्द्र पश्चिमोत्तर भारत था।
भारत में अधिकतर कुषाण नगर मथुरा से तक्षशिला जाने वाले
पश्चिमोत्तर मार्ग या उत्तरापथ पर पड़ते थे।
मथुरा में ‘सींख’ की खुदाई में कुषाण काल के सात स्तर दिखते हैं
जबकि गुप्त काल के मात्र एक स्तर।
Wednesday, 11 May 2016
बर्फ पहाड़ो में क्यों गिरती है ।
सर्दी के मौसम में पहाड़ों और ठन्डे क्षेत्रों में गिरने वाली बर्फ
वास्तव में पानी का ही एक जमा हुआ रूप है। जब बर्फ गिरती है तो
यह रुई के छोटे-छोटे रेशों कि तरह मुलायम और सफ़ेद होती है।
बर्फ के इन टुकड़ों कि रचना मणिमय(Crystalline) होती है। ये
हेक्सागोनल (Hexagonal)होते हैं। ये टुकड़े सूर्य के प्रकाश के
सभी रंगों को परावर्तित कर देते हैं इसलिए इनका रंग सफ़ेद दिखाई
देता है। क्या तुम जानते हो बर्फ कैसे गिरती है?
गर्मी के कारण समुद्रों,नदियों,झीलों,तालाबों आदि का पानी
वाष्पित होता रहता है। यह जलवाष्प हवा से हलकी होती है और
हल्केपन के कारण यह वायुमंडल में ऊपर उठती जाती है। यही वाष्प
वायुमंडल में बादलों का रूप धारण कर लेती है। हम जानते हैं कि
ऊँचाई के साथ-साथ वायुमंडल का तापमान भी काफी कम होता
जाता है और कम तापमान वाले हिस्सों में अधिक जलवाष्प नहीं समा
सकती। इस प्रकार वायुमंडल के ऊपरी क्षेत्रों में जलवाष्प की
मात्रा उसकी क्षमता से अधिक हो जाती है। इस स्थिति में
वायुमंडल में उपस्थित धुल और धुएं के कणों पर जलवाष्प संघनित
(Condensed) होकर ठण्ड के कारण बर्फ के कणों में बदल
जाती है। ये कण एक दूसरे से चिपक कर बर्फ के मणियों
(Crystals) में बदल जाते हैं। जब इनका भार अधिक हो जाता है
तो ये बर्फ के टुकड़ों (Snowflakes) के रूप में नीचे गिरने लगते
हैं। यह बर्फ पहाड़ों कि चोटियों पर जमा होती रहती है।
अब प्रश्न उठता है कि बर्फ पहाड़ों पर ही क्यों गिरती है मैदानों में
क्यों नहीं गिरती? किसी स्थान पर बर्फ का गिरना दो बातों पर
निर्भर करता है-उस स्थान कि समुद्र तल से ऊँचाई और भूमध्य
रेखा से दूरी। जो स्थान समुद्र तल से जितना अधिक ऊंचा होगा
और भूमध्य रेखा से जितना अधिक दूर होगा वहां बर्फ गिरने कि
संभावना भी अधिक होगी। वायुमंडल में जलवाष्प से बनने वाली
बर्फ कि मात्रा बहुत अधिक होती है लेकिन इसका बहुत थोड़ा
हिस्सा ज़मीन पर बर्फ के रूप में गिरता है और अधिक हिस्सा वर्षा
के रूप में गिरता है। जिन क्षेत्रों का तापमान अधिक होता है उन
स्थानों पर गिरने वाले बर्फ के कण वायुमंडल में ही पिघल कर
वर्षा कि बूंदों का रूप धारण कर लेते हैं। लेकिन पहाड़ों के ऊपर
तापमान कम होने के कारण बर्फ के गिरने वाले कण पिघल कर पानी
में नहीं बदल पाते हैं बल्कि पहाड़ों के ऊपर बर्फ के रूप में ही जमा
होते रहते हैं। यही बर्फ अपने दबाव के कारण सख्त होती जाती है।
बर्फ का गिरना हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी है। पहाड़ों पर
जमी बर्फ के पिघलने से ही नदियों को गर्मियों में पानी मिलता है।
यही पानी खेतों कि सिंचाई के काम आता है। बर्फ के टुकड़ों के बीच
में वायु होती है इसलिए यह ऊष्मा कि कुचालक (Bad
Conductor) होती है। इसी कारण बर्फ धरती के ऊपर कम्बल
का काम करती है। इसी गुण के आधार पर बर्फ कि चट्टानों को
खोदकर घर बना लेते हैं जिनमे ठण्ड बहुत कम लगती है। बर्फ के
प्रभावों से बचने के लिए पहाड़ी इलाकों में मकान की छतें ढालू बनाई
जाती हैं जिससे गिरने वाली बर्फ खिसक-खिसक कर ज़मीन पर
आती रहती है। इससे मकानों के टूटने का डर नहीं रहता।